प्रेम कहानियों के दुःखद अंत

चालाकी का अर्थ है : परिणाम / हिसाब
April 12, 2020
Mount Abu Trip 2020
September 2, 2020
Show all

प्रेम कहानियों के दुःखद अंत

हृदय से प्रेम करने वालों को अक्सर मैंने अंततः रोते हुए देखा है और सुना भी है, उनकी प्रेम कहानियों के अंत हमेशा दुखद ही होते है क्यों की वो निस्वार्थ भाव से प्रेम में पड़ते है और हृदय से जुड़ जाते है, जब ये हृदय के बंधन टूटते है तो वो अत्यंत दुखद, कष्टकारी, और दुर्भाग्यपूर्ण होते है और जो प्रेम कहानियाँ स्वार्थ स्वरूप बनती है उनके अंत में  दुख की कोई गुंजाइश ही नहीं होती है !!

जो प्रेम कहानियाँ  लाखों लोगों के लिए एक अच्छा सा सबक बन सकती थीं। क्यों वो आखिर में लोगों को अंततः सजग कर जाती है। एक गहरी सी सीख जो हृदय को तमाम जख्मों से छलनी कर जन्म लेती है। एक सबक जो तमाम सपनों को एकजुट कर जलाए जाने के बाद शेष अवशेषों से मिलता है ! सकारात्मक सीख, प्रेमपूर्ण भावनाओं सहित एक आनंदयुक्त जीवन का आधार बनने से वंचित रह जाती वो प्रेम कहानियाँ अंततः घृणा और नफरत का आधार बन जाती है !

 

2019 खत्म होने को था,  जहा लोग नए साल का स्वागत  कर रहे थे वही किसी के साथ कुछ ऐसी घटनाएं घटी है जिन्होंने उसे  दूरियों की दुःखद काल्पनिकतायें दी है एक दूसरे से बिछड़ने के हृदयघाती विचार जो उसे  मौत से भी बदतर प्रतीत हुए होंगे ! वर्ष 2020  के शुरू होते होते वह अपनी वर्षों पुरानी प्रेम कहानी हमेशा के लिए धीरे धीरे  खो रहा है इसका उसे जरा भी अंदेशा न था !!

वो कहानी जिसकी शुरुआत  अप्रैल – 2016 में हुई थी , तमाम घटनाओं के चलते, मिलते और बिछड़ते आखिर 2018 से वो  एक खूबसूरत प्रेम के सफर पर घनिष्ठता पूर्वक चल पड़े थे। वो ये भी जानते थे कि उनका मिलना लगभग नामुमकिन है पर प्रेम में ही वो ताक़त है जो किसी भी नामुमकिन को मुमकिन में बदलने की ताकत रखता है। उन्होंने  हर संभव कोशिश की कि मैं जिसे वो हृदय से चाहे उसी के साथ अपना ये सारा जीवन कटे, पर उन्हें नहीं पता था कि प्रेम अपने साथ अपना प्रतिद्वंदी भी लेकर चलता है। अंततः प्रेम कमजोर पड़ा और प्रतिद्वंदी जीत चुका था। वो कहते है न भींड़ के पक्ष में सारी दुनिया हो जाती है और सच अकेला ही टूटकर बिखर जाता है !!

एक ऐसा प्रतिद्वंदी जो हजारों वर्षों पहले जन्मा था, जिसे जन्म के समय से ही सिखाया गया था कि प्रेम तुम्हारा पहला और अंतिम दुश्मन है जो जीवन पर्यंत दुश्मन ही रहेगा। ये कुछ शैतानी बुद्धिजीवियों के मस्तिष्क की उपज थी। जिसे न जाने किन किन तथ्यों से जोड़ा गया ताकि जबतक भारत देश रहे तब तक उसका वजूद कायम रहे।

आखिर उस अजर अमर प्रतिद्वंदी का नाम है – “” इज्जत “”

वो इज्जत ही थी जिसने वर्षो के गहरे प्रेम को इस कदर झकझोरा और जड़ों सहित उखाड़ फेंका था। जिसकी कल्पना उन्होंने  सपनों में भी नहीं की थी।

वो  रोया गिड़गिड़ाया था, भीख मांगी थी क्यों कि वो  अपने हृदय को मरते हुए नहीं देखना चाहता था पर उसे  देखना पड़ा था, सब कुछ घुट-घुट कर महसूस करना पड़ा था !!

आज लगभग उसके  पास जरूरत की हर चीज है  पर वो अपना हृदय खो चुका है , वो हँसी, वो खुशी, वो भावनाएं खो चुका है । वो आखिर  कैसे उसकी संपन्नता का जश्न मनाये, नहीं आती वो फीलिंग्स, जो उसे जीवित सा बनाती थी। सच कहूँ तो वो  आत्मिक तौर पर मृत है । हाँ कहने और दिखाने को ये जिस्म जिंदा है। पर वो जीवित भावनाएं अब  मरती जा रही है !

 

आखिर पिता के मान सम्मान व इज्जत की बात थी,

वही पिता जब बेटी के विवाह हेतु दहेज के बंदोबस्त खातिर आजीवन दम घोंटता है वो दर्द, वो सब समाज को भी नहीं दिखता ! मेरे समझ में नहीं आता इस अतुलनीय प्रेम से इंसान की इज्ज़त कैसे चली जाती है। वो प्रेम जो हमें जीना सिखाता है, भावुक बनाता है, दयाशील एवं करुणामय कर देता है। प्रेम जो दहेज को नहीं स्वीकारता, प्रेम जो जहरीली जातिगत दीवारों को तोड़ता है, प्रेम जो सम्पूर्ण दुनियां को समानता की दृष्टि से देखता है, आज उसी प्रेम के हम कट्टर दुश्मन बनें बैठे है।

 

इज्जत के दुष्परिणाम

* दहेज इज्जत की वजह से जिंदा है !

* धर्म और जातियाँ इज्जत की वजह से जिंदा है, जिनका फायदा महज ये है कि समय समय पर मार काट और झगड़ों की वजह बनती है !

* हज़ारों स्त्रियाँ जिंदा जला दी गयी इज्जत की वजह से !

* इज्जत के दम पर हजारों वर्षों तक शूद्रों ने सवर्णों के मार्मिक अत्याचार सहे !

* इज्जत के दम पर वो सब मनुष्यजाति खासकर स्त्रियों से करवाया गया जो उन्हें नहीं करना चाहिए था। जो पूर्ण रूप से उनके मानवाधिकारों का हनन है !

* युवाओ का आत्मदाह !

*इज्जत के लिए प्यार करने वालों की हत्या करना

 

अधिकांश बुद्धिजीवियों के मन में कुछ प्रश्न आ कूदेंगे जिनके जवाब मैं पहले ही दिए देता हूँ।

लोग ज्ञान देंगे कि प्रेम तो हम अपनी माँ, अपनी बहनों से भी कर सकते है।

उन बुद्धिजीवियों को बताना चाहूँगा कि उनके जैसी सोच लगभग हर भारतीय के पास है, हर भारतीय नवयुवा अपनी माताओं से बेहद प्रेम करता है, अपने पिता और अपनी बहनों से भी करता है, परंतु जैसे ही इन रिश्तों से जरा दूर चलते है और सारा प्रेम छू, जबकि प्रेम तो हमें निस्वार्थ बनाता है। अगर वास्तव में इन संबंधों में निस्वार्थ प्रेम का वास होता तो सारी दुनिया प्रेम के रंग में रंग जानी चाहिए थी पर क्यों अरबों खरबों इंसानों के प्रेम करने के वावजूद दुनिया इतनी कुरूप, इतनी घृणायुक्त होती जा रही है।

वजह महज यही है कि हम अपने स्वार्थ को प्रेम समझ बैठे है। अपने करीबी रिश्तों को प्रेम समझना बहुत ही बड़ी भूल है।  ये रिश्ते तो महज शुरुवाती सीढ़ियाँ है जो प्रेम के विराट वृक्ष पर जाने का मार्ग बन सकती है। परंतु जैसे ही हम रिश्तों से हटकर प्रेम में पड़ते है तो इज्जत रूपी दैत्य कहर बनकर प्रेम करने वालों पर टूट पड़ता है। और प्रेम की यात्रा यहीं से नष्ट कर दी जाती है। बचा हुआ जीवन हम घृणा, क्रोध, लोभ, लालच, स्वार्थ जैसे अधर्मों में काटते नजर आते है। इस प्रकार हम प्रेम जैसे अमृत से अनभिज्ञ के अनभिज्ञ ही रह जाते है, और स्वार्थ को प्रेम-प्रेम कहते नजर आते है, और इसी स्वार्थ की वजह से ही प्रेम के कट्टर दुश्मन भी है। जैसा मेने पिछले आर्टिकल में लिखा था जो भी हम करते हैं, उसमें हिसाब है.

प्रेम तो कुछ और ही है जिसकी झलक लाखों में कुछ एक को ही मिल पाती है, जिसका वर्णन भी शब्दहीन है ! निश्छलता से किया गया प्रेम, हृदय को जीवंत बनाता है तथा आत्मिक उन्नति लाता है। अंततः प्रेम निखर कर अध्यात्म के मार्ग पर चल पड़ता है और इस प्रकार एक महान कथन की उत्पत्ति होती है !!

 प्रेम है द्वार प्रभु का 

और यह सत्य भी है, जिसे प्रेम का ज्ञान नहीं, जिसे प्रेम की समझ नहीं, वो चाहे कितने भी प्रयत्न कर ले ईश्वर की शरण में जाने के – वो सब व्यर्थ के व्यर्थ ही है। सिर्फ प्रेम ही वो सीढ़ी है जो ईश्वर तक जाने के मार्ग का निर्माण करती है। पूजा-पाठ, ढोल-मंजीरों से कुछ भी न घटित होने वाला !!

प्रेम कहानी का दुखद अंत 

इस तरह एक खूबसूरत सी प्रेम कहानी अपना अंत तय करते हुए दफन होने को थी, पर वो  नहीं चाहता कि उसका प्रेम बदनामी के कफन में लपेटा जाए और इज्जत की चिता पर जलाया जाए और समाज जश्न मनाए !! ये वही अंधा अनपढ़ समाज है जो इज्जत के तर्क को न समझते हुए प्रेम जैसी ईश्वरीय देन को इज्जत के कठघरे में खड़ा कर अन्याय की सूली पर चढ़ा देता है। अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है ये !! खासकर मिटती मानवता के इस दौर में !!

Note 1:
प्रेम में वासना विलीन हो जाती है, वासना के विलीन होते ही प्रेम पूज्यनीय और आदर योग्य हो जाता है, परंतु आजकल के लोग और युवा वासना से ही नहीं छूट पाते है और वासना को ही प्रेम समझ बैठते है। जब तक प्रेम – बुद्धि से, मन से करते रहोगे वासना मालिक बनी रहेगी, जब तक हृदय को मालिक न बनाओगे तब तक प्रेम को कभी जान ही न पाओगे। हाँ ये जोखिम भरा जरूर है, सारी दुनिया यहाँ तक कि अपने भी दुश्मन बने बैठे है, परंतु जो जोखिम उठाने की हिम्मत रखते है वही अमृत जैसे प्रेम का रसपान कर पाते है !!

दयालु बनें !! अधिक से अधिक जीवों को भी प्रेम करें !! प्रेम का सम्मान करें व अन्य को भी सिखाएं !!!

खुद की समझ और विवेक से जिये न कि समाज की धर्मांधता और जातिगत कट्टरता में सम्मिलित होकर स्वयं की शिक्षा और स्वयं की चेतना का आत्मदाह करें !!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *